सठ सुधरहिं सतसंगति पाई ।
पारस परस कुधात सुहाई ।।
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं ।
फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ।। (1/2/5)
दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस पत्थर के स्पर्श से लोहा सोने में परिवर्तित हो जाता है । दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने मूल गुणों का ही अनुसरण करते हैं। ( जिस प्रकार साँप की मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती और अपने सहज गुण प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार सज्जन लोग दुष्टों के साथ रहकर भी दूसरों को ज्ञान ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता )
Through contact with the noble persons even the wicked get reformed, just as a base metal is transformed by the touch of the philosopher’s stone. On the other hand, if by mischance good men fall into evil company, they maintain their noble character like the gem hidden in the hood of a serpent
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