बंदऊँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ ।
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ ।। 1/3 (क)
मैं संतों को प्रणाम करता हूँ जिनके चित्त में सभी के लिए समानता का भाव होता है, जिनका न कोई मित्र है और न ही कोई शत्रु । जैसे अंजलि में रखे हुए सुंदर फूल (जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिसने उनको रखा ) उन दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगंधित करते हैं । वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं ।
I bow to the saints who are even-minded towards all and have no friend or foe, just as a flower of good quality placed in the palm of one’s hands spreads its fragrance alike to both the hands ( the one which plucked it and that which held and preserved it )
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